।। ज़िन्दगी और हम ।।
अक्सर हम जब किसी को भी सोच रहे होते हैं तो सिर्फ उसी को सोचते है... नींद में भी उसी को याद करते हैं... उसके दुखों पर रोने का मन करता है ।।
संसार का मैं एक ऐसा person हूं जो त्रासदी के हर दुखों को भोग चुका हूं ... ये कौन लाता है दुखों को.. अपने आप आ जाते हैं मालूम नहीं कहां कहां से...
आज office में बैठकर मैं बचपन याद कर रहा था ... फिर survey के लिए बाहर
metro में बैठा तो connought place आया वैसे ही मुझे door will open on left वाली आवाज़ से दुःख होने लगा ... वैसे ही असमान्य दुःख है फिर लिखते हुए ...
मुझे एक पेंटिंग याद आती है जिसमें छोटे छोटे नीले पहाड़, एक आधी सुनहरी ज़मीन पर पेड़ और ज़रा सी घास। क़ायदे से ऐसी तस्वीर में हमेशा एक नदी होती थी और चाँद...एक नाव होती थी पाल वाली और उसमें अकेली बैठी एक लड़की, जाने क्या सोचती हुयी।। मैं बड़ी सी झील की कल्पना करता था और उसमें किसी नाव में देर रात तक अकेले जा रहा होता था। उन दिनों ऐसे अकेले अकेले चले जाने में या रात को इस तरह झील पर नाव में बैठे होने में डर नहीं लगता था। मैं छोटा था। डर मेरे लिए कोई किताब की चीज़ थी। टैंजिबल नहीं। काल्पनिक।।
मेरे लिए चीज़ों के सच होने की शर्त इतनी ही है कि मैं उसे छू सकूँ। पहली बार coll किया तो झूठ लगा कि शायद वो झूठ बोल रहे हों। फिर हम जब उस हॉल से बाहर निकल आए तो पता लगा उनकी आवाज़ में वो इत्र नहीं है जो खुशी में महकता है...वो फिर से किसी कहानी का किरदार लगने लगे... दो बेटियों के बाद इस बार तीसरी बेटी की आशा नहीं थी... फिर भी नियति का रंग गाढ़ा होता है वही दिखा.... ऐसी चीजें चुभती हैं ।।
metro में बैठा तो connought place आया वैसे ही मुझे door will open on left वाली आवाज़ से दुःख होने लगा ... वैसे ही असमान्य दुःख है फिर लिखते हुए ...
मुझे एक पेंटिंग याद आती है जिसमें छोटे छोटे नीले पहाड़, एक आधी सुनहरी ज़मीन पर पेड़ और ज़रा सी घास। क़ायदे से ऐसी तस्वीर में हमेशा एक नदी होती थी और चाँद...एक नाव होती थी पाल वाली और उसमें अकेली बैठी एक लड़की, जाने क्या सोचती हुयी।। मैं बड़ी सी झील की कल्पना करता था और उसमें किसी नाव में देर रात तक अकेले जा रहा होता था। उन दिनों ऐसे अकेले अकेले चले जाने में या रात को इस तरह झील पर नाव में बैठे होने में डर नहीं लगता था। मैं छोटा था। डर मेरे लिए कोई किताब की चीज़ थी। टैंजिबल नहीं। काल्पनिक।।
मेरे लिए चीज़ों के सच होने की शर्त इतनी ही है कि मैं उसे छू सकूँ। पहली बार coll किया तो झूठ लगा कि शायद वो झूठ बोल रहे हों। फिर हम जब उस हॉल से बाहर निकल आए तो पता लगा उनकी आवाज़ में वो इत्र नहीं है जो खुशी में महकता है...वो फिर से किसी कहानी का किरदार लगने लगे... दो बेटियों के बाद इस बार तीसरी बेटी की आशा नहीं थी... फिर भी नियति का रंग गाढ़ा होता है वही दिखा.... ऐसी चीजें चुभती हैं ।।
आज सुबह निर्मल वर्मा को पढ़ रहा था - दूसरी दुनिया। उसमें वे बोर्खेस की बात करते हुए बताते हैं कि बोर्खेस के एक वक्तव्य के बाद एक श्रोता ने पूछा कि “आप अपनी ज़िंदगी में कौन सी चीज़ सबसे ज़्यादा महसूस करते हैं?”… बोर्खेस ने अपनी थकी आँखों से हमारी ओर देखा, “हमेशा लगता है कि मैं कहीं भटक गया हूँ, हमेशा यही लगता है।”
बस " मैं भी आपकी आंखों में खुशी देखना चाहता हूं " ।।
बस " मैं भी आपकी आंखों में खुशी देखना चाहता हूं " ।।
ज़िन्दगी मैथ भी नहीं, फ़िज़िक्स का कोई unsolvable equation हुए जाती है। एकदम अबूझ कि step-by-step marking के बावजूद नम्बर बहुत कम आ रहे ....क्या चाहती है ज़िन्दगी हमसे सब कुछ unsetting है भगवान भी कुछ सुनता नहीं ... कितने विलग होते जा रहे हैं 😥

Exectly 😊
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