नसों में कहानियां उमगती हैं ।। मैं जहाँ होता हूँ वहाँ से चल पड़ता हूँ, अक्सर एक व्यथा यात्रा बन जाती है । - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना [साभार कविता कोश] बहुत साल पहले कभी पहली बार पढ़ी होगी ये कविता। लेकिन कितना पहले और ज़िंदगी के किस पड़ाव पर, याद नहीं। इसकी आख़िरी पंक्ति मेरी कुछ सबसे पसंदीदा पंक्तियों में से एक है। ‘अक्सर एक व्यथा, यात्रा बन जाती है’। इसके सबके अपने अपने इंटर्प्रेटेशन होंगे, क्लास में किए गए भावानुवाद या कि संदर्भ सहित व्याख्या से इतर। रूमी की एक पंक्ति, What you seek is seeking you... ज़िंदगी में एकदम सही साबित होती है। मुझ तक दुनिया भर की बेहद उदास और ख़ूबसूरत चीज़ें पहुँचती हैं। ख़ुद ही। कई साल पहले दिल्ली आया था पहली बार, उसके बाद गूगल का अल्गोरिथ्म जानता है कि मुझे दुःख के बारे में जानना होता है... पता नहीं क्यूँ। दुःख,प्रेम, विरह का लोगों के जीवन में इतना करीबी से ताना बाना क्यूं है ?? एक दूसरी किमवदंति ये है कि दुनिया के आख़िर छोर पर भरम का समंदर है। वहाँ का रास्ता इतना मुश्किल है और बीच के शहरों में इतनी बरसातें कि जाते जाते लगभग सारे रंग धुल जाते हैं बदन...