।। प्रेम, उलाहना और ज़िन्दगी ।।
नसों में कहानियां उमगती हैं ।।
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है ।
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
[साभार कविता कोश]
मैं जहाँ होता हूँ
वहाँ से चल पड़ता हूँ,
अक्सर एक व्यथा
यात्रा बन जाती है ।
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
[साभार कविता कोश]
बहुत साल पहले कभी पहली बार पढ़ी होगी ये कविता। लेकिन कितना पहले और ज़िंदगी के किस पड़ाव पर, याद नहीं। इसकी आख़िरी पंक्ति मेरी कुछ सबसे पसंदीदा पंक्तियों में से एक है। ‘अक्सर एक व्यथा, यात्रा बन जाती है’। इसके सबके अपने अपने इंटर्प्रेटेशन होंगे, क्लास में किए गए भावानुवाद या कि संदर्भ सहित व्याख्या से इतर।
रूमी की एक पंक्ति, What you seek is seeking you... ज़िंदगी में एकदम सही साबित होती है। मुझ तक दुनिया भर की बेहद उदास और ख़ूबसूरत चीज़ें पहुँचती हैं। ख़ुद ही। कई साल पहले दिल्ली आया था पहली बार, उसके बाद गूगल का अल्गोरिथ्म जानता है कि मुझे दुःख के बारे में जानना होता है... पता नहीं क्यूँ। दुःख,प्रेम, विरह का लोगों के जीवन में इतना करीबी से ताना बाना क्यूं है ??
एक दूसरी किमवदंति ये है कि दुनिया के आख़िर छोर पर भरम का समंदर है। वहाँ का रास्ता इतना मुश्किल है और बीच के शहरों में इतनी बरसातें कि जाते जाते लगभग सारे रंग धुल जाते हैं बदन से। प्रेम, उलाहना, विरह…सब, बस आत्मा के भीतरतम हिस्से में बचा रह जाता है इंतज़ार का रंग। भरम के समंदर का खारा पानी सबको बर्दाश्त नहीं होता। लोगों के पागल हो जाने के क़िस्से भी कई हैं। कुछ लोग उल्टियाँ करते करते मर जाते हैं। कुछ लोग समंदर में डूब कर जान दे देते हैं। लेकिन जो सख़्तज़ान पचा जाते हैं भरम के खारे पानी को, उनके इंतज़ार पर भरम के पानी का नमक चढ़ जाता है। वे फिर इंतज़ार भूल जाते हैं। लेकिन इसके साथ वे इश्क़ करना भी भूल जाते हैं। फिर किसी जादूगर का जादू उन पर नहीं चलता। किसी लड़की का जादू भी नहीं।
आज मैं दिल्ली के connought place पर हूं बहुत तेज धूप है ।Survey के लिए १० बजे से बैठे हैं पालिका बाजार के 5no.Entrygate पर ।।
मैंने बहुत ज़्यादारिपोर्ट्स नहीं पढ़ी और फ़ायनैन्सेज़ की बहुत ज़्यादा समझ नहीं है।लेकिन इतना ज़रूर लगता है कि कोई एकव्यक्ति बहुत मेहनत करता है एक ब्रैंड बनाने की, उसे इस्टैब्लिश करने की कोशिश करता है। जिस दौर में सारे ब्रैंड्ज़ इम्पोर्टेड हैं, जींस से लेकर पिज़्ज़ा तक.इसमें कुछ ब्रैंड बैग के है।।जीवन में कुछ sad place होते हैं जैसे मैं आज एक बैग बेचने वाले से मिला वो मेरे पास बैग बेचने के लिए आया था ढेर सारा बैग लादे हुए हाथ पैर गले सब में ,अचानक उसके घर से पैसों के लिए फोन आता है हताश हो जाता है बड़बड़ाता है "ग्रेजुएशन का क्या फायदा जब बैग ही बेचना था" मैं स्तब्ध निगाहों से उसे देखता रहता हूं जैसे उसे जाते हुए देखने की और इच्छा हो बात करने की भी ..पर कोई क्या कर सकता है थोड़े पैसे देकर कोई किसी का घर थोड़े चला सकता है "ये मेरे लिए sad प्लेस था" ।।
मैंने बहुत ज़्यादारिपोर्ट्स नहीं पढ़ी और फ़ायनैन्सेज़ की बहुत ज़्यादा समझ नहीं है।लेकिन इतना ज़रूर लगता है कि कोई एकव्यक्ति बहुत मेहनत करता है एक ब्रैंड बनाने की, उसे इस्टैब्लिश करने की कोशिश करता है। जिस दौर में सारे ब्रैंड्ज़ इम्पोर्टेड हैं, जींस से लेकर पिज़्ज़ा तक.इसमें कुछ ब्रैंड बैग के है।।जीवन में कुछ sad place होते हैं जैसे मैं आज एक बैग बेचने वाले से मिला वो मेरे पास बैग बेचने के लिए आया था ढेर सारा बैग लादे हुए हाथ पैर गले सब में ,अचानक उसके घर से पैसों के लिए फोन आता है हताश हो जाता है बड़बड़ाता है "ग्रेजुएशन का क्या फायदा जब बैग ही बेचना था" मैं स्तब्ध निगाहों से उसे देखता रहता हूं जैसे उसे जाते हुए देखने की और इच्छा हो बात करने की भी ..पर कोई क्या कर सकता है थोड़े पैसे देकर कोई किसी का घर थोड़े चला सकता है "ये मेरे लिए sad प्लेस था" ।।
विचारशील है जहां हम नेताओं के पीछे चिल्ला रहे वहीं देश की अर्थव्यवस्था इतना चरमरा रही , रोजगार की तरफ कोई ध्यान नहीं ।।
दुःख के बारे में लिखना उससे आज़ाद हो जाना है।
दुःख के बारे में लिखना उससे आज़ाद हो जाना है।
इसे लिखने से डरना उसे अपने अंदर पनपते हुए देख कर बारिश और मेघ से घबराना है। मैं लिख लेता हूँ तो फिर से नयी हो जाती है नज़र। धूप और बारिश को देख कर गुनगुना सकता हूँ।
मेरे पास बहुत से सवाल हैं और इनका कोई जवाब नहीं। बस एक गहरी उदासी है।।
#उत्तम
#उत्तम

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