शहर दिल्ली और वो

तुम्हें मालूम, तुम्हारी आवाज़ के एक कतरे से दिल के तहखाने का ताला खुल सकता है…तुम्हारा एक वॉइस नोट है, उसमें सबसे चहकते हुए तुम ‘हेलो’ कहती हो। जैसे कि तुम्हें पूरा यकीन हो कि हम जल्द मिलेंगे । मुझे लगता है, हम-में कोई धागा है, जन्मपार का बँधा हुआ।
और मेरी हथेली पर बेनाम लकीरों की नदियां बही हुई हैं ..
तुम्हें याद करता हूं तो पूरा शहर याद आ जाता है जहां से मेरी तमाम सी यादें जुड़ी हुई हैं और तुम भी।
कुछ शहर नक्शे पर होते हैं,
पर कुछ शहर दिल में।
दिल्ली मेरे लिए दिल में बसा हुआ शहर है। जब भी दिल्ली का नाम सुनता हूँ, तो न जाने क्यों मन के किसी कोने में B.Tech के वे दिन चुपचाप जाग उठते हैं। ऐसा लगता है जैसे वक्त ने अचानक कई साल पीछे धकेल दिया हो और मैं फिर उसी उम्र में खड़ा हूँ—जब आँखों में भविष्य के सपने थे, जेब में थोड़े से पैसे थे और दिल में किसी के लिए बहुत सारा प्यार।
वह उम्र भी क्या उम्र थी…
कैंटीन की कुल्हड़ चाय में  एक अलग मिठास थी।
मेट्रो की भीड़ में भी एक अपना-सा सुकून था।
दिल्ली की भागती हुई जिंदगी के बीच मैं अलग छोटी सी दुनिया में रहता था।
शहर दिल्ली से बेइंतहा मुहब्बत करने के कोई सुबूत नहीं हैं मेरे पास, सिवाए इसके कि किसी रैंडम से दिन बहुत मुश्किल से पाया हूं एक ख़ाली शाम में लिखने बैठा हूँ, कहानी मिजाज में घुली हुई है। नदी पास में है और बारिश का मौसम है तो लबालब भरी हुई भी। लोग इर्द-गिर्द हैं। मैं किसकी याद में हूँ, मालूम भी नहीं। मुहब्बत को तो उस गांव में भी याद करते हैं, जहाँ उसके होने का कोई ठिकाना नहीं होता। शहर दिल्ली में अभी पलाश और सेमल खिले होंगे। गार्डन में बोगनविला के उस पेड़ पर झूम कर गुलाबी रंग खिला होगा। हौज खास की इमारतों के पत्थर अब पूरी तरह धीपते नहीं होंगे। शाम को वहाँ बैठा जा सकता है। तुम्हारी कॉल आते ही अक्षरधाम में तुमसे मिलना और तुम्हें समझाना, कि देखो, ज़िंदगी अभी कमरे से बाहर भी है। कि देखो, शाम के रंग सुंदर हैं। कि देखो, तुम्हरे अपने पर्सनल दुख के अलावा दुनिया कितनी बड़ी है।।
मेरे भीतर अब कहानियाँ नहीं उगतीं, लेकिन कभी कभी पुरानी कहानियाँ सुनाने का मन करता है। मेरी ख़ुद की। धूप, समंदर, आसमान की कहानी। उन लड़कियों की जिन्हें प्यार होता था। जो चाय के एक घूँट पर मन में समंदर लिए चलती थीं। मुझे लगता है जैसे मेरे जैसे लोगों की दुनिया में कहीं जगह नहीं हैं। टू सेंसिटिव। ज़्यादा ही दुखता है, ज़्यादा ही ख़ुश हो लेते हैं। ज़्यादा मुहब्बत हो जाती है। ज़्यादा जलन होती है। कम में जीना आया ही नहीं। मेरे जैसे लड़कों को कहीं जगह नहीं है दुनिया में, इसलिए कहानियों में अपने हिस्से की ज़मीन चाहते हैं हम। थोड़ी सी। 
लिखना भी आदत है। शायद मूवी या कार चलाने की तरह। बहुत साल छोड़ दें तो थोड़ा स्लो हो जाता है। लेकिन बस डेस्क पर बैठ भी जायें तो काफ़ी कुछ लिखा जाता है। इसे पहले की तरह ही ब्लॉग पर पोस्ट कर रहे हैं। कि आज के लिए मन में इतना ही कुछ है। 

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