Intzaar Kar

शाख के पत्ते मानिंद टूट गये,
उनके हरा होने का इंतजार कर॥
जान थी जिस तन की उसके दिल की
उनके धागों को जुड़ने का इंतजार कर ॥

जिंदा हो जमी पर पड़ी पड़ी तुम
कभी कदमो के आहट कूचने का इंतजार कर !!

मुसीबतों में शायद फना हो गये उसूल उनके,
अभी मिजाज-दिल बदलने का इंतजार कर ॥

ताले लटक रहे साँकल के दरवाजे की चौखट पर,
यादों को दस्तक देने का इंतजार कर ॥

जाने पहचाने क़दम पड़े हैं आहट के अब
ग़म -ए-इश्क दौर से राहत का इंतजार कर ॥
#उत्तम त्रिपाठी

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