तुम ही तुम

तुम्हारा यूं मुझे "सरकार" कहना,
मुझे अपनी ग़ज़लों से भी ज्यादा हसीं लगता है..
जैसे दूर क्षितिज पर मानो टिमटिमाते तारे,
तुम्हारी इसी आवाज़ से जीवित हैं ।।
झरनों की मौज, पक्षियों का चहचहाना,
सुबह की ठंडक, सावन की बरसात
सत्य और असत्य, तिमिर और प्रकाश
मालूम होता है..
ये सब तुम्हारी इसी आवाज़ से निर्मित है ।।
पता है जब..
चांदनी रात में छम्म करती तुम्हारी मधुर सरगम वाली पायल,
मुझे शून्य बनाकर मूक कर जाती हैं तो,
प्रकृति भी मुझे तुमसे मिलने को बहुत आतुर करती है ।।
इक बात कहूं #सरकार
मुझे सम्पूर्ण अस्तित्व में..
बस तुम ही तुम लगती हो ।।
#उत्तम त्रिपाठी

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