हां मैं वहीं था

प्रिए,
तुम्हारे नेह भरे लफ्जो से,
हृदय पिघल रहा है...
जैसे धरा क्षितिज पर
जाकर सिमट रहा है ।।
उपवन में नाचते मोरो ने...
दिल में इक अजीब सी ख्वाहिश जागृत
किए हैं ।।
जिस चांदनी रात का तुम जिक्र कर रही
हां मै वही था,
बिल्कुल तुम्हारे समीप , तुम्हे चाह रहा था,
तुम्हे सुन रहा था, पर तुम्हे छूने की कोई उत्कंठा न थी,
मेरी प्रीत बिल्कुल चकोर सी थी
और पता है,
ये सब क्यों?
क्योंकि मुझे अच्छा सा लगता है,
तुम्ही को चाहते रहना,
तुम्ही को सुनते रहना,
बहुत गहरे ख्यालों में,,,,,
मोहब्बत के हवालों में
तुम्हारा नाम आ जाना अच्छा लगता है ।।
और मै इस अहसास को कभी,
भूलना नहीं चाहता,
हां मैं वहीं था
हां मैं वहीं था प्रिय ।।
# उत्तम त्रिपाठी

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