मैं लिखता हूं कि कुछ कह सकूं, जैसे बारिश के बाद धूप, वैसे मैं लिखता हूं कि तुम्हे गुनगुना सकूं । ये सिलसिले शाश्वत तक चलते रहेंगे और हम तुम्हे शब्दों में शाश्वत तक लिखते रहेंगे, मैं लिखता हूं इसलिए की तुम्हे सुन सकूं !!
तुम्हें मालूम, तुम्हारी आवाज़ के एक कतरे से दिल के तहखाने का ताला खुल सकता है…तुम्हारा एक वॉइस नोट है, उसमें सबसे चहकते हुए तुम ‘हेलो’ कहती हो। जैसे कि तुम्हें पूरा यकीन हो कि हम जल्द मिलेंगे । मुझे लगता है, हम-में कोई धागा है, जन्मपार का बँधा हुआ। और मेरी हथेली पर बेनाम लकीरों की नदियां बही हुई हैं .. तुम्हें याद करता हूं तो पूरा शहर याद आ जाता है जहां से मेरी तमाम सी यादें जुड़ी हुई हैं और तुम भी। कुछ शहर नक्शे पर होते हैं, पर कुछ शहर दिल में। दिल्ली मेरे लिए दिल में बसा हुआ शहर है। जब भी दिल्ली का नाम सुनता हूँ, तो न जाने क्यों मन के किसी कोने में B.Tech के वे दिन चुपचाप जाग उठते हैं। ऐसा लगता है जैसे वक्त ने अचानक कई साल पीछे धकेल दिया हो और मैं फिर उसी उम्र में खड़ा हूँ—जब आँखों में भविष्य के सपने थे, जेब में थोड़े से पैसे थे और दिल में किसी के लिए बहुत सारा प्यार। वह उम्र भी क्या उम्र थी… कैंटीन की कुल्हड़ चाय में एक अलग मिठास थी। मेट्रो की भीड़ में भी एक अपना-सा सुकून था। दिल्ली की भागती हुई जिंदगी के बीच मैं अलग छोटी सी दुनिया में रहता था। शहर दिल्ली से बेइंतहा मुहब्बत करन...
जामाना अब बेरहम सा लगता है, मुस्कुराना उनका का अब बहुत खलता है, शख्त मुस्किल में हूँ ये खुदा की क्या करू मैं अब पीछे पीठ के भोकना छूरा अब यहां चलन सा लगता है !! चुनुं कंकर..या नगीना बांध लूँ , छोडू साहिल या सफीना मांग लूं, ज़माने! तू मुझसे जलता बहुत है तू कहे तो छोड जीना मैं मृत्यु मांग लूँ !! #उत्तम त्रिपाठी
एक दिन छत पर फड़फडाती गौरैया, सागर ढूँढ लेगी.. मजदूर अपने हक़ की खाने लगेगा सरकार मजलूमों के लिए काम करने लगेगी, किसानो की फसलें लहलहा उठेंगी.. दुनिया बदल जाएगी और तुम लौट आओगी , मेरे इंतजार को ख़तम करने....!!
क्या खूब कहा है आपने
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