मोहब्बत की तो की...

नजर-ए-उल्फत को हम जफा नहीं कहते,
मोहब्बत जिसने भी की उसे हम बेवफा नहीं कहते,
तुम रोज़ कहती हो आऊंगी तो बताऊंगी,
अजी आओ तो,
तुम्हारी इस फिक्र को अब हम खता नहीं कहते,

हमेशा कहता हूं बालों को जरा खोलकर रखा करो,
बंधी हुई जुल्फों को अब हम घटा नहीं कहते..

रोज़ आती हो ख्वाबों का मंज़र सजाकर,
सुला जाती हो मुझको अपनी पलकें बिछाकर,
होगी लाख बुराइयां तुममें तो क्या?
अनजाने में भी हम तुम्हे बुरा नहीं कहते,
इश्क़-इश्क़ है सरकार नशा नहीं कहते,
मोहब्बत की तो की इसे बेहया नहीं कहते ।।
 #उत्तम त्रिपाठी

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